हड़ताळ मृदंग हुहुकट हाकट - Hartal Mridang Hukat Hakat | 4K Full Lyrics Video

हड़ताळ मृदंग हुहुकट हाकट - Hartal Mridang Hukat Hakat | 4K Full Lyrics Video



पण देवा…

देवा सो ना दास अण विलासे

वलु धाय करे

पण गंगा, गंगा गोथां खाय

ऐ ये वो कोक जो जटाधर कागड़ा

भभके गण भूत भयंकर

भूतल नाथ अंधन्त्र ते नखते

बण के तल अम्बर बधाय भंखर

गाजत जंगर पांख गते


डमरूय डड़ंकर, डड़ंकर, डड़ंकर

डमरू ये डड़ंकर बाह

डड़ंकर शंकर ते कैलाश सरे..

परमेश्वर मोज धरी पशुपालण

काम परजालण नाच करे जी

काम परजालण नाच करे


हडडं खडडं ब्रह्मांड हले

डडडं डडडा कर डाक बजे

जलल दग जवाल कराल जरे

सचर थडडं गण साज सजे

कडक़े धरणी डडडं डडडं

हडडं मुख नाथ गर्जत हरे

परमेश्वर मोज धरी पशुपालण

काम परजालण नाच करे जी

काम परजालण नाच करे जी

काम परजालण नाच करे


हड़ताल मृदंग हहुकट हाकट

धाकट धिकट नाद धरे

द्रह द्राह दिदिकट विकट दोकट

फट फरंगत फेर फरे

धधडे नग धोम धधाकट धीकट

हड़ताल मृदंग हहुकट हाकट

धाकट धिकट नाद धरे

द्रह द्राह दिदिकट विकट दोकट

फट फरंगत फेर फरे

धधडे नग धोम धधाकट धीकट

चैंघट घोर कृताल धरे

परमेश्वर मोज धरी पशुपालण

काम परजालण नाच करे जी

काम परजालण नाच करे, शम्भू..


सरणाई सेंसाट अपार छटा

चहु थाट नगाराय चोब रडे

करताल थपाट झपाट कटाकर

ढोल धमाकट मेर पडे

उमिया संग नाट गणु सर्वेश्वर

ईश्वर थई तंता उचरे..

परमेश्वर मोज धरी पशुपालण

काम परजालण नाच करे जी

काम परजालण नाच करे जी

काम परजालण नाच करे


पण देवो नी आगत दूत..

अन रूपला कायम रिये

पण भेला, भेला राखे भूत

ऐ वो तो कैलाश वालो कागड़ा

नाचत नी शंका मृगमृग पंखा

घममम घमका घुँघुरु का

ढोलूं का ढमका होवद हमका

डम-डम, डम-डम डम डिमाग

डिम-डिम डिमाग, डिम-डिम डिमाग

हे डम-डम डमका डमरू का

रणतुर रणका भेद भणका

गगन झणका गहरेशा..


जयदेव, जयदेव, जयदेव सिद्धेशा

हरण कलेशा, मगन हमेशा

माहेशा जी, मगन हमेशा माहेशा..

हरी ओम..


हर हर, हर हर, हर हर, हर हर

महादेव शम्भू त्रिपुरारी, जटाधर

शंकर, शंकर, शंकर, शंकर, शंकर, शंकर

महादेव…


हरी ओम हर हरना ज्यां नाद

त्यां शीश भाण उगे दिन रात

तुज विण दीप प्रदीप ना वात

शिव छो कण-कण मां हयात

शिव ने भजो दिन ने रात

शिव ने भजो दिन ने रात

शिव ने भजो दिन ने रात

शिव ने भजो दिन ने रात… 

हड़ताल मृदंग हहुकट हाकट” आजकल बहुत वायरल हो रहा. वास्तव में यह भोले चारणीय आराधना है, जिसके बोल (LYRICS) कागबापू और प्रदीप गढ़वी द्वारा लिखित है. इसमे स्वर दिया है मुक्तिदान गढ़वी जी ने और यह भगवान शिव को समर्पित है। 

यह चारण जाति के लोगों द्वारा गाया जाता है, इसलिए इसे चारणीय आराधना कहते हैं, और इसका शुद्ध उच्चारण और सफल गायन भी चारण लोग ही कर सकते हैं। 

जैसे ही यह आराधना गीत प्रकाशित हुआ, इंटरनेट पर जमकर वाइरल होने लगा। कंटेन्ट क्रियेटर्स ने इसे अपने रील्स और शॉर्ट्स पर खूब संवारा। भगवान शिव को समर्पित यह भजन अपने आप में मंत्रमुग्ध करने की क्षमता रखता है।

जिसमें ध्वन्यात्मक शब्द (डमरू की ध्वनि, मृदंग, नगाड़े, हुंकार आदि) के साथ शिव के महिमा, उनके नृत्य, भूतगण और कैलास पर्वत की दिव्यता का वर्णन है।

मैं आपको इसका **भावार्थ (हिंदी अनुवाद)** देता हूँ। चूँकि मूल रचना में ध्वनि-आलंकार बहुत अधिक है (डडडं, धडधडं, हुहुकट आदि), उसे मैं अर्थ में परिवर्तित कर रहा हूँ ताकि अर्थ स्पष्ट हो जाए:

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### हिंदी अनुवाद / भावार्थ

**“पण देवा…”**

हे देव! तुम्हारे बिना कोई दास भी सुख और विलास नहीं पाता।

तुम्हारी ही ओर सब भागते हैं।

गंगा माँ की धारा तुम्हारे जटाओं में बह रही है,

जटाधारी महादेव! तुम्हारे सिर पर कौवा (कागड़ा = शिव का प्रतीक) बैठा है।

भूत-प्रेत और गण तुम्हारे चारों ओर हैं।

धरती और आकाश में गड़गड़ाहट मच रही है।

जंगलों में गर्जना गूँज रही है।

डमरू की गूँज उठ रही है –

**“डड़ंकर, डड़ंकर, डड़ंकर…”**

कैलाश पर्वत पर स्वयं शंकर का डमरू बज रहा है।

परमेश्वर पशुपालक रूप में आनंद से तांडव कर रहे हैं,

काम (वासना) का पराजय करके नृत्य कर रहे हैं।

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**“हडडं खडडं ब्रह्मांड हले…”**

शिव के डमरू की ध्वनि से ब्रह्मांड काँप रहा है।

ढोल-नगाड़े गर्जना कर रहे हैं।

ज्वालाएँ भड़क उठी हैं।

गण देवता वाद्य सजाकर साथ दे रहे हैं।

धरती हिल रही है।

शिवनाथ के मुख से गर्जना गूँज रही है।

परमेश्वर आनंदित होकर नृत्य कर रहे हैं।

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**“हड़ताल मृदंग हहुकट हाकट…”**

मृदंग की गड़गड़ाहट, हुंकार और ललकार चारों ओर गूँज रही है।

अद्भुत और विकट स्वर-लहरियाँ फैल रही हैं।

डमरू और नगाड़ों की ध्वनि से आकाश काँप रहा है।

शिवजी के आनंदमय तांडव में पूरा वातावरण झूम रहा है।

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**“सरणाई सेंसाट अपार छटा…”**

सरणाई (शहनाई) और नगाड़ों का नाद गूँज रहा है।

करताल की झंकार, ढोल की धमक से चारों ओर उत्सव का दृश्य है।

सर्वेश्वर शिव अपने गणों संग तांडव नृत्य कर रहे हैं।

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**“पण देवो नी आगत दूत…”**

देवताओं के दूत शिव के पास आते हैं।

भूत-प्रेत भी उनके साथ रहते हैं।

कैलाश पर जटाधारी महादेव अपने नृत्य में मग्न हैं।

घुँघरूओं की झंकार, ढोल की धमक और डमरू की आवाज़ से गगन गूँज रहा है।

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**“जयदेव, जयदेव, जयदेव सिद्धेशा…”**

जय हो हे सिद्धेश्वर!

जो कष्टों का हरता है,

जो सदैव मगन रहते हैं,

जय हो हे महादेव!

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**“हरी ओम…”**

जहाँ शिव का नाद है, वहाँ दिन-रात प्रकाश फैला है।

तुम्हारे बिना कोई दीपक भी प्रकाश नहीं देता।

कण-कण में शिव विद्यमान हैं।

दिन-रात शिव का भजन करो,

हर पल शिव को स्मरण करो।

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### संक्षेप में भावार्थ

यह सम्पूर्ण रचना शिवजी के **तांडव नृत्य** का अद्भुत चित्रण है।

* शिव के जटाओं में गंगा का बहना,

* डमरू और मृदंग की ध्वनि से ब्रह्मांड का काँपना,

* भूतगणों का साथ देना,

* नगाड़ों और करतालों का नाद,

* शिव का वासना को जीतकर नृत्य करना,

* और अंत में *“हर-हर महादेव”* की पुकार—

  इन सबका एक विराट चित्र खड़ा किया गया है।

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