एक मासूम की जान लेना मतलब सारी इंसानियत के कत्ल के बराबर है, क्या कुरान यही कहता है ?/ Killing an innocent is equivalent to killing all of humanity. Is this what the Quran says?

एक मासूम की जान लेना मतलब सारी इंसानियत के कत्ल के बराबर है, क्या कुरान यही कहता है ?/Killing an innocent is equivalent to killing all of humanity. Is this what the Quran says?





कुरान की कुछ चुनिन्दा आयतों का हिंदी ट्रांसलेशन।👇🤨

जिन लोगों ने इनकार किया और हमारी आयतों को झुठलाया, वही आग में पड़नेवाले हैं, वे उसमें सदैव रहेंगे। चैप्टर 2/आयत 39, 
इनकार करनेवाले नहीं चाहते, न किताबवाले और न मुशरिक कि तुम्हारे रब की ओर से तुमपर कोई भलाई उतरे। 2/105 
तुम ईमानवालों का शत्रु सब लोगों से बढ़कर यहूदियों और बहुदेववादियों (हिन्दुओं) को पाओगे। 5/82 
अल्लाह ही पूज्य है, उसके सिवा कोई पूज्य नहीं। 3/2 
जो कोई अल्लाह और उसके फरिश्तों और उसके रसूलों और जिबरील और मीकाईल का शत्रु हो, तो ऐसे इनकार करनेवालों का अल्लाह शत्रु है।" 2/98 
दीन (धर्म) तो अल्लाह की नजर में इस्लाम ही है। 3/19 
जो इस्लाम के अतिरिक्त कोई और दीन (धर्म) तलब करेगा तो उसकी ओर से कुछ भी स्वीकार न किया जाएगा। और आख़िरत में वह घाटा उठानेवालों में से होगा। 3/85 
तुम पर युद्ध अनिवार्य किया गया है।" 2/216 
अतः यदि युद्ध में तुम उनपर क़ाबू पाओ, तो उनके साथ इस तरह पेश आओ कि उनके पीछेवाले भी भाग खड़े हों, 8/57
 जिन लोगों ने इनकार की नीति अपनाई, उन्हें दुनिया और आखीरत में कड़ी यातना दूँगा। उनका कोई सहायक न होगा।" 3/56 
यदि वे तुमसे युद्ध करें तो उन्हें कतल करो - ऐसे इनकारियों का ऐसा ही बदला है। 2/191 
रहे वे लोग जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया, हम उन्हें क्रमशः तबाही की ओर ले जाएँगे, ऐसे तरीक़े से जिसे वे जानते नहीं। 7/182 
तुम कुछ ऐसे लोगों को भी पाओगे, जो चाहते हैं कि तुम्हारी ओर से निश्चिन्त होकर रहें और अपने लोगों की ओर से भी निश्चिन्त होकर रहें। परन्तु जब भी वे फसाद और उपद्रव की ओर फेरे गए तो वे उसी में औंधे जा गिरे। तो यदि वे तुमसे अलग-थलग न रहें और तुम्हारी ओर सुलह का हाथ न बढ़ाएँ, और अपने हाथ न रोकें, तो तुम उन्हें पकड़ो और कतल करो, जहाँ कहीं भी तुम उन्हें पाओ। उनके विरुद्ध हमने तुम्हें खुला अधिकार दे रखा है। 4/91 
फिर, जब हराम (प्रतिष्ठित) महीने बीत जाएँ तो मुशरिकों को जहाँ कहीं पाओ कतल करो, उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो और हर घात की जगह उनकी ताक में बैठो। फिर यदि वे तौबा कर लें और नमाज कायम करें और जकात दें तो उनका मार्ग छोड़ दो, 9/5 
वे किताबवाले जो न अल्लाह पर ईमान रखते हैं और न अन्तिम दिन पर और न अल्लाह और उसके रसूल के हराम ठहराए हुए को हराम ठहराते हैं और न इस्लाम का अनुपालन करते हैं, उनसे लड़ो, यहाँ तक कि वे सत्ता से अलग होकर और छोटे (नीच) बनकर जजिया देने न लग जायें। 9/29, 
अतः जो कुछ ग़नीमत (लूट) का माल तुमने प्राप्त किया है, उसे वैध-पवित्र समझकर खाओ और अल्लाह का डर रखो। 8/69,
 तुमने उन्हें क़त्ल नहीं किया बल्कि अल्लाह ही ने उन्हें क़त्ल किया और जब तुमने (उनकी ओर मिट्टी और कंकड़) फेंका, तो तुमने नहीं फेंका बल्कि अल्लाह ने फेंका। 8/17, 
अल्लाह तुम्हारे हाथों से उन्हें यातना देगा और उन्हें अपमानित करेगा 9/14, 
ये युद्ध के दिन हैं, जिन्हें हम लोगों के बीच डालते ही रहते हैं और ऐसा इसलिए हुआ कि अल्लाह ईमानवालों को जान ले और तुममें से कुछ लोगों को गवाह बनाए 3/140, 
तुम्हें एक ऐसे समुदाय का रूप धारण कर लेना चाहिए जो नेकी की ओर बुलाए और भलाई का आदेश दे और बुराई से रोके। 3/104, 
तुम्हारी स्त्रियाँ तुम्हारी खेती हैं। इसलिए जिस प्रकार चाहो तुम अपनी खेती में आओ और अपने लिए आगे भेजो। 2/223 
क्या तुमने यह समझ रखा है कि जन्नत में यूँ ही प्रवेश करोगे, जबकि अल्लाह ने अभी उन्हें परखा ही नहीं जो तुममें जिहाद करनेवाले हैं। 3/142, 
ऐ लोगो! एक मिसाल पेश की जाती है। उसे ध्यान से सुनो, अल्लाह से हटकर तुम जिन्हें पुकारते हो वे एक मक्खी भी पैदा नहीं कर सकते। यद्यपि इसके लिए वे सब इकट्ठे हो जाएँ और यदि मक्खी उनसे कोई चीज़ छीन ले जाए तो उससे वे उसको छुड़ा भी नहीं सकते। बेबस और असहाय रहा चाहनेवाला भी (उपासक) और उसका अभीष्ट (उपास्य) भी। 22/73, 
निश्चय ही तुम और वह कुछ जिनको तुम अल्लाह को छोड़कर पूजते हो सब जहन्नम के ईधन हो। तुम उसके घाट उतरोगे।" 21/98 
ये रहीं कुरान की कुछ गिनी-चुनी आयतें जबकि पूरा कुरआन ऐसी ही ज़हरीली आयतों से भरा पड़ा है। यही है कुरान की सच्चाई। जबतक इस दुनिया में कुरान जैसी नफरत फैलाने वाली किताबें पढ़ी जाएगी तब तक इस धरती पर पूरी मानवता पर संकट बना रहेगा। 

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