सभी धर्मों के लोगों को खुला चैलेंज, An open challenge to people of all religions.

सभी धर्मों के लोगों को खुला चैलेंज,

नीचे सनातन धर्म की किताबों से जो बातें निकालकर आपके सामने रखी हैं वो अपने धर्मग्रंथ में ढूंढकर बताएं अन्यथा ये कहना बंद कर दें कि हमारा मजहब सबसे अच्छा है क्योंकि सच्चाई तो ये है कि बाकी सारे मजहबों का मकसद केवल अपनी कम्युनिटी की आबादी बढ़ाकर पूरी दुनिया पे हुकूमत करना है किसी भी मनुष्य को अच्छा इंसान बनाना नहीं है।

यदि हम प्रत्येक नागरिक को सही शिक्षा और संस्कार देकर एक अच्छा इन्सान बनाने में सफल हो जाते हैं तो एक अच्छी दुनिया का निर्माण हो सकता है क्योंकि एक अच्छे इंसान से एक अच्छा परिवार बनता है अच्छे परिवार मिलकर एक अच्छा समाज बनाते हैं और एक अच्छा समाज ही अच्छा देश बना सकता है।

उदाहरण -1

यह प्रसिद्ध वाक्यांश महा उपनिषद् के अध्याय 6, मंत्र 72 में मिलता है। यह श्लोक इस प्रकार है:

अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् ।

उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥

अर्थ:

यह मेरा है, यह उसका है, ऐसी सोच छोटे दिल वाले लोगों की होती है।  विशाल हृदय वाले लोगों के लिए तो पूरी पृथ्वी ही एक परिवार है।

यह श्लोक भारतीय दर्शन और सनातन धर्म के उस उदारवादी और वैश्विक दृष्टिकोण को दर्शाता है, जिसमें समस्त मानवता को एक परिवार के रूप में देखा जाता है।


उदाहरण -2

गरुड़ पुराण के उत्तर खण्ड (प्रेत कल्प) के अध्याय 35, श्लोक 51 में एक श्लोक मिलता है, जो इस प्रकार है:

"सर्वेषां मङ्गलं भूयात् सर्वे सन्तु निरामयाः। 

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥"

बाद में ये श्लोक बदलकर ये हो गया:-

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत् ।।


अर्थ:

सभी सुखी हों, सभी निरोगी हों, सभी का कल्याण हो, और कोई भी दुखी न रहे। 

यह विश्व शांति और कल्याण की कामना करने वाला एक अत्यंत लोकप्रिय और व्यापक रूप से उद्धृत संस्कृत श्लोक है।

 पूरी धरती के लोगों को परिवार समझने वाला, पूरी धरती के लोगों को एक समान मानने वाला सभी के कल्याण की प्रार्थना करने वाला एकमात्र धर्म सनातन धर्म ही है। 

उदाहरण - 3

यह प्रसिद्ध श्लोक मनुस्मृति (Manusmriti) के अध्याय 3, श्लोक 56 (Chapter 3, Verse 56) में लिखा है

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।

यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ।।

अर्थ-

जिसका अर्थ है कि जहाँ नारियों का सम्मान होता है वहां देवता निवास करते हैं और जहां नारियों का सम्मान नहीं होता है उनके अच्छे कर्म भी उनका भला नहीं कर सकते अर्थात आप चाहे कितने भी धार्मिक व्यक्ति क्यों न हो यदि आप नारी का सम्मान नहीं करते उसको पूज्य नहीं मानते तो आपका धार्मिक होना केवल एक दिखावा है और इसका आपको कोई फायदा नहीं होने वाला भले ही आपने कितने अच्छे कर्म क्यों न करे हों।

उदाहरण - 4

मनुर्भव जनया दैव्यं जनम्"  ऋग्वेद (10.53.6) का एक महत्वपूर्ण मंत्र है, 

जिसका अर्थ है "मनुष्य बनो और दिव्य (देवताओं जैसे गुणों वाले) लोगों को जन्म दो"; यह हमें पहले स्वयं सत्य, अच्छे और सुंदर गुणों से युक्त सच्चा मनुष्य बनने और फिर ऐसी ही गुणवान, परोपकारी, और ज्ञानी संतानों (दैव्यं जनम्) को पैदा करने की प्रेरणा देता है, जो समाज और विश्व के कल्याण के लिए कार्य करें, न कि केवल शारीरिक रूप से मनुष्य बनें. 

श्लोक का अर्थ और संदर्भ

मनुर्भव (Manurbhav): इसका अर्थ है 'मनुष्य बनो', लेकिन यह केवल मानव शरीर धारण करने से नहीं, बल्कि मनुष्योचित गुणों (जैसे उदारता, करुणा, सत्यनिष्ठा, ज्ञान) को धारण करने से है; यह एक जीवन भर की साधना है जो आत्मनिरीक्षण और अच्छे कर्मों से आती है.

जनया दैव्यं जनम् (Janaya Daivyam Janam): इसका अर्थ है 'दिव्य लोगों को जन्म दो', यानी ऐसी संतानें उत्पन्न करो जो देवत्व के गुणों से युक्त हों, जो विद्या और ज्ञान का दान करें, जो समाज के कल्याण के लिए काम करें और जो पशुता से दूर हों.

मूल संदेश: यह मंत्र कहता है कि हमें पहले स्वयं को पूर्ण मनुष्य बनाना है (जो ज्ञान, सत्य और अच्छे कर्मों से युक्त हो), और फिर ऐसी ही श्रेष्ठ संतानों को जन्म देना है, जो समाज के लिए देवतुल्य हों. यह ज्ञान के माध्यम से मनुष्यता की साधना और समाज के प्रति कर्तव्य पर जोर देता है. 

उदाहरण - 5 धर्म क्या है ?

 मनुस्मृति के छठे अध्याय के 92वे श्लोक (6.92) में धर्म के 10 लक्षण बताए गए हैं अर्थात यदि कोई धर्म ये 10 चीजें नहीं सिखा रहा हैं तो वो सच्चा धर्म है ही नहीं।

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।

धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥ (मनुस्मृति 6.92) 

 जिसमें धैर्य (धृति), क्षमा, आत्म-संयम (दम), चोरी न करना (अस्तेय), पवित्रता (शौच), इंद्रिय-निग्रह, बुद्धि (धी), विद्या, सत्य और क्रोध न करना (अक्रोध) को धर्म के दस लक्षण बताया गया है, जो मानव के आचरण का सार है। 

अर्थ (दस लक्षण):

धृति : धैर्य और स्थिरता।

क्षमा : क्षमाशीलता और सहनशीलता।

दम : मन पर नियंत्रण रखना।

अस्तेय : चोरी न करना।

शौच : आंतरिक और बाहरी पवित्रता।

इन्द्रियनिग्रह : इंद्रियों को वश में रखना।

धी : विवेकपूर्ण बुद्धि।

विद्या : सच्चा ज्ञान प्राप्त करना।

सत्य : सत्य बोलना।

अक्रोध : क्रोध न करना। 

निष्कर्ष

1. सनातन धर्म ही एकमात्र है जो किसी को अपना दुश्मन नहीं मानता है।

2. सनातन धर्म ही एकमात्र है जो पति को परमेश्वर और पत्नी को अर्धांगिनी का दर्जा देता है।

3. सनातन धर्म ही एकमात्र है जो नारी को देवी का दर्जा देता है।

4. सनातन धर्म ही एकमात्र है जिसमें भाई बहन के रिश्ते की मिठास को कायम रखने के लिए रक्षाबंधन का त्यौहार मनाया जाता है।

5. सनातन धर्म ही एकमात्र है जिसमें पति पत्नी के बीच प्रेम का प्रतीक करवा चौथ का त्यौहार मनाया जाता है।

6. सनातन धर्म ही एकमात्र है जिसमें गुरु को ईश्वर के समान पूज्य माना जाता है।

7. सनातन धर्म ही एकमात्र है जिसमें आपको सवाल पूछने का हक है जिसे शास्त्रार्थ कहते हैं वरना बाकी में तो सवाल पूछने पर बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है।

8. सनातन धर्म ही एकमात्र है जिसमें प्रकृति भी पूजनीय है जिससे उसका रक्षण हो सके और उसका दुरूपयोग न हो।

9. सनातन धर्म ही एकमात्र है जिसमें नास्तिक को भी जीने का अधिकार है।

10. सनातन धर्म ही एकमात्र है जो आपको अपने हिसाब से जिंदगी जीने की खुली छूट देता है वो भी बिना किसी पाबंदी के।

अब आप स्वयं सोचिए कि इससे बेहतर फिलोसॉफी क्या हो सकती है जो सनातन धर्म अपने धर्मग्रंथों के माध्यम से एक आम इन्सान को दे रहा है ? 

क्या अब भी आपको लगता है इससे बेहतर कोई और धर्म हो सकता है ? यदि आपको ऐसा लगता है तो पहले अपने धर्मग्रंथ चेक करें फिर आपका सारा भ्रम दूर हो जाएगा।

🙏 नमस्कार 🙏

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