सनातन धर्म में युद्ध के नियम, मानवता की पराकाष्ठा, Rules of war in Sanatana Dharma, the pinnacle of humanity,
रामायण तथा महाभारत काल में युद्ध के क्या नियम थे ?
प्राचीन भारत में युद्ध मुख्य रूप से 'धर्म-युद्ध' (पूर्व-निश्चित आचार संहिता) के नियमों के अनुसार लड़े जाते थे। इन नैतिक नियमों के तहत युद्ध में आम जनहानि को रोकने के लिए कई सख्त प्रावधान किए गए थे, जो कि वर्तमान अंतरराष्ट्रीय नियमों (जैसे जिनेवा कन्वेंशन) के समान ही उन्नत थे।प्राचीन भारतीय युद्धों (विशेषकर महाभारत और रामायण काल) के मुख्य नियम निम्नलिखित थे :बराबरी का मुकाबला: युद्ध में समान स्तर के योद्धा ही आपस में लड़ सकते थे। रथी (रथ वाले) केवल रथी से, घुड़सवार केवल घुड़सवार से और पैदल सैनिक केवल पैदल सैनिक से ही युद्ध करेगा।समय की पाबंदी: युद्ध केवल सूर्योदय के बाद ही शुरू होते थे और सूर्यास्त के समय शंखनाद के साथ रोक दिए जाते थे। सूर्यास्त के बाद दोनों पक्षों के सैनिक आपस में मित्रवत मिल सकते थे।निहत्थे और घायल पर वार मनाही: जिस योद्धा का हथियार या रथ टूट गया हो, जो युद्धभूमि छोड़कर भाग रहा हो, भयभीत हो या घायल हो, उस पर प्रहार करना वर्जित था।आत्मसमर्पण की सुरक्षा: यदि कोई योद्धा अपने बचाव में असमर्थ हो, होठों पर तिनका दबाकर या हाथ जोड़कर आत्मसमर्पण कर दे, तो उसे बंदी तो बनाया जा सकता था लेकिन मारना सख्त मना था। विजेता का कर्तव्य था कि वह ऐसे शत्रु की चिकित्सा करे और उसे सुरक्षित घर पहुँचाए।गैर-लड़ाकों (नागरिकों) की सुरक्षा: युद्ध के मैदान में सीधे भाग न लेने वाले लोगों—जैसे सारथी, ढोल बजाने वाले, शंख वादक, किसान, महिलाओं, बच्चों, वृद्धों और संन्यासियों पर हमला करना पाप माना जाता था।अमानवीय हथियारों पर प्रतिबंध: युद्ध में विष (जहर) बुझे हुए बाणों या आग से तपे हुए घातक हथियारों का इस्तेमाल प्रतिबंधित था।इन नियमों के अलावा, एक और नीति होती थी जिसे 'कूट-युद्ध' (छल-कपट वाला युद्ध) कहा जाता था, लेकिन इसे धर्म के विरुद्ध माना जाता था और सामान्यतः इसका प्रयोग वर्जित था।
आप इस जानकारी को नीचे दिए गए गूगल बटन पर क्लिक करके भी देख सकते हैं।
Tags:
सनातन धर्म
